December 2007
45 posts
रैलियों की राजधानी →
राजधानियों को कई लाभ मिलते हैं जो उनके हैं ही तो कुछ और ‘लाभ’ उन्‍हें घलुए में मिलते हैं। दिल्‍ली सदियों से राजधानी है जिसमें पिछले छ: दशक स्‍वतंत्र लोकतांत्रिक देश की राजधानी के रूप में रहे हैं। उससे पहले भी स्‍वतंत्रता आंदोलन के दिनों में भी यह लोकतांत्रिक संघर्षों की जगह तो थी ही। इसलिए दिल्‍ली सहज ही रैलियों की राजधानी भी है। बोट क्‍लब, रामलीला मैदान, लालकिला मैदान इन जगहों ने न...
Dec 31st
समस्या है….. →
Dec 31st
मरफ़ी के नए साल के नए नवेले नियम →
· नया साल नई समस्याएँ लेकर आता है. · नया साल सर्वथा नवीन, नूतन समस्याएँ लेकर आता है. · नया साल पुराने संकल्पों को ही लेकर आता है. . नए साल के संकल्प जिस गंभीरता से लिए जाते हैं वे उससे ज्यादा गंभीरता से निभाए नहीं जाते. · नए साल में पुराने संकल्प ज्यादा गंभीरता से लिए जाते हैं और वे उसी गंभीरता से निभाए नहीं जाते. · नए साल के नए संकल्पों का भी आमतौर पर वही हश्र होते हैं जो आपके पिछले...
Dec 30th
संडे दिन ही है चिरकुटई का →
कुछ ब्‍लॉगर मित्र संडे की ब्‍लॉगिंग को संडे चिरकुटई कहकर करते हैं, कुछ समूची ब्‍लॉगिंग को चिरकुटई घोषित कर चुके हैं। अब प्रमोदजी से तो कोई पंगा लेने से रहा…जब वे कहते हैं कि वे महान हैं तो हम मान लेते हैं कि वे हैं और अब वे कह रहे हैं कि वे चिरकुट हैं तो हम होते कौन हैं कहने वाले  कि वे नहीं हैं- वे महान हैं, वे चिरकुट हैं और जब जक कि वे और खोजें कि वे इसके अलावा क्‍या क्‍या हैं हम माने लेते...
Dec 30th
2007 में इंटरनेटी हिन्दी – कैसे बीता साल? →
इंटरनेटी हिन्दी के लिए वर्ष 2007 अच्छा-खासा घटनाओं भरा रहा और कुल मिलाकर एक विहंगम दृष्टि डालें तो यह वर्ष हिन्दी के लिए बड़ा ही लाभकारी रहा. साल के शुरूआत में ही हिन्दी जगत को नायाब तोहफ़ा मिला था – इंटरनेट के जाने पहचाने, सुप्रसिद्ध साहित्यिक जाल स्थल अभिव्यक्ति और अनुभूति अंततः यूनिकोड में आ गए. इसके ठीक कुछ ही दिनों बाद खबर मिली कि हिन्दी समाचारों की लोकप्रिय साइट प्रभासाक्षी ने नित्य 3 लाख...
Dec 29th
अब तालाबंद मोहल्‍ला भी काहे का मोहल्‍ला... →
सराए में राकेश ने हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग पर कार्यशाला का आयोजन किया था। रविकांत थे, सराए की शोधकर्त्री होने के नाते नीलिमा थीं। विनीत भी थे और चोटी के ब्‍लॉगर अविनाश थे। बंधुआ घाघ होने के नाते हम भी पहुँचे थे। सराए कॉपीलेफ्ट, ओपन सोर्स की अहम जगह है इसलिए बात सहज ही कापीराइट वगैरह पर पहुँच गई। रविकांत का कहना था जिससे हमारी पूरी सहमति है कि जिन्‍हें लगता है कि उनका लिखा सिर्फ ‘उनका’ रहे...
Dec 29th
लीजिए स्‍वागत करें हिन्‍दी के कच्‍चे रास्ते पर... →
हमने अपने मित्र की हिन्‍दी यूनिकोड से टेक्‍टाइल जद्दोजहद की चर्चा की थी। और लीजिए म्‍यूजिकेडिमिक वाले  कच्‍चे रास्‍ते की पहली खट खट हो गई है ब्‍लॉगजगत के दरवाजे पर। कच्‍चे रास्‍ते के राही हमारी तरह हिंदीबाज नहीं हैं, शैक्षिक जगत के व्‍यक्ति हैं विषय है इतिहास। ग्रामोफोन इंडस्‍ट्री के इतिहास पर शोधलीन हैं। शास्‍त्रीय संगीत की अच्‍छी समझ है। उनका वायदा है कि इन सभी विषयों पर वे अपनी अंगुलियॉं चलाते...
Dec 28th
विज्ञापन अच्छे हैं... →
किसी बढ़िया तेज रफ़्तार फ़िल्म के क्लाइमेक्स के ठीक पहले टीवी पर एक छोटा सा ब्रेक ले लिया जाए और अंतहीन विज्ञापनों का सिलसिला प्रारंभ हो जाए तो शर्तिया आपको विज्ञापनों से घृणा होने लगेगी. परंतु रुकिये, हममें से बहुतों के लिए विज्ञापन अच्छे हैं, और, वे और बेहतर होने जा रहे हैं… गूगल अपना नया नवेला सेलफोन, जिसके बारे में कयास लगाए जा रहे हैं कि वो फरवरी 2008 में आने वाला है, उन लोगों को...
Dec 28th
जमीन के नीचे से केबलचोरी के हुनर का निजीकरण →
कम्यूनिस्‍ट नहीं हैं, इस विचारधारा का घणा विरोध किया है इतना कि कई बार तो लोग सिर्फ इस विरोध की बुनियाद पर मानते रहे हैं कि जरूर ‘संघी’ ही होउंगा। वो भी नहीं हूँ। ये अकेला अंतर्विरोध नहीं है व्‍यक्तित्‍व में अपने और भी ढेरों हैं। दरअसल इस लिहाज से देखा जाए तो सिर्फ ब्‍लागिंग ही एकमात्र जगह हे ज‍हॉं हमारी निभ रही है वरना हर खांचा एक या दूसरी किस‍म की कैडरबद्धता की मांग करता है।...
Dec 28th
विवाहित ब्‍लॉगर की ये बेतार आजादी →
ब्‍लॉगराईन होना गज़ब की त्रासदी है, पति है पर नहीं है क्‍योंकि ब्‍लॉगर है। आधुनिक यशोधरा हैं बेचारी। पर वो कहानी तो हो चुकी।ये भी कहा था हमने कि अगर ब्‍लॉगराइन खुद ब्‍लॉगर हो तो करेला नीम चढ़ जाता है। कई तकलीफें हैं इस जोड़े को। कुछ को गिना देते हैं- आपको ब्‍लॉगिंग की खुड़क ठीक तब ही उठती है जबकि आपके पति/पत्‍नी का का कब्जा कंप्‍यूटर पर होता है। जब आप साम दाम दंड भेद से कंप्‍यूटर हथियाते हैं तब...
Dec 27th
हनी, आई श्रंक द पिक्स... →
पिछले दिनों मेरा पॉप3 ईमेल क्लाइंट जाम हो गया. मेरा थंडरबर्ड जाम हो गया, जबकि कनेक्शन बढ़िया था. वो किसी एक ईमेल को डाउनलोड करने का प्रयास कर रहा था. समस्या की जड़ में जाकर देखा तो पता चला कि वो कोई 6 मेबा के एक चित्र को डाउनलोड करने की कोशिश कर रहा था. वह चित्र मेरे एक मित्र ने भेजा था जिसने नया नया हाई एण्ड कैमरा लिया था. हम सभी अपने ईमेल व चिट्ठों में चित्रों का जमकर प्रयोग करते हैं. चाहे...
Dec 27th
देखन में छोटे लगें लाभ दें भरपूर... →
ये किसी एडसेंसिया ब्लॉग पोस्ट की बात नहीं हो रही है. दरअसल इस ब्लॉग पोस्ट का आइडिया मोकालू गुरु के भूत ने पिछले दिनों मेरे सपने में आकर दिया था. किताबों की फुटपाथिया दुकानों में आपको ऐसी सैकड़ों किताबें मिल जाएंगीं जिनमें लाल किताब से लेकर तंत्र मंत्र और जादू टोने तक – यानी हर किस्म की सामग्री मिलेगी. और, शायद यही वजह है कि भारत में आज भी जादू टोना और तंत्र मंत्र चल रहा है. कुछ समय पहले तक...
Dec 26th
कुछ टिप्पणी चर्चा →
कुछ दिन पहले श्रीलाल शुक्लजी के बारे में लिखी एक पोस्ट पर नितेश एस. जी की यह टिप्पणी थी- हिन्दी मे इतना जबरदस्त माल नेट पर उपलब्ध है, सोचा न था. ज्ञानदत्त जी और आप सभी के ब्लोग्स को कुछ ही दिन पहले नारद द्वारा देखने का मौका मिला.तिस पर शुक्ल जी के रागदरबारी […]
Dec 26th
ऑनलाइन चिट्ठा समस्या निराकरण गोष्ठी का सादर... →
दोस्तों, हम सभी चिट्ठाकारों को समय समय पर तकनीकी दिक्कतें झेलनी होती हैं. खासकर हिन्दी के मामले में. हममें से कोई भी – फिर से एक बार, कोई भी सर्वज्ञ नहीं है, और आज का विषय विशेषज्ञ कल को बेकार हो जाता है क्योंकि तकनीक नित्य बदलती रहती है. जाहिर है, आज का हमारा लिखा-पढ़ा कल को बेकार हो जाता है. ऐसे में अपने ज्ञान को नित्य ब्रशअप करने के अलावा कोई चारा नहीं होता है. इसी बात को मद्देनजर रखते हुए...
Dec 25th
Nalanda -- हमारी धरोहर है। →
“नालंदा” जिसका अर्थ है ज्ञान बाँटने वाला, जहाँ से भारत में सांस्कृतिक व दार्शनिक विचारधारा का सूत्रपात हुआ। जिस समय विश्व अपने अस्तित्व को अंधकार में तलाश रहा था, हमारा नालंदा अपनी ज्ञान गंगा से जगत की पाप-पंकिल-शरीरी को पवित्र करने में जुटा था। उस जमाने में विश्व ध्यान-योग की शिक्षा इसकी गोद में बैठकर पूरा कर रहा था। पटना (बिहार) से लगभग 90 km की दूरी पर स्थित यह महान धरोहर अपने...
Dec 23rd
फिल्म समीक्षाः तारे जमीन पर →
इस तरह की फिल्में सालों में कभी बनती हैं और जब भी बने तो उन्हें थियेटर में ही देखना चाहिये। तारे जमीन पर भी ऐसी ही बनी एक खूबसूरत फिल्म है। तारे जमीन पर को हिन्दी फिल्मी दुनिया की लाइफ इस ब्यूटीफूल कहूँ तो शायद कोई अतिश्योक्ति नही होगी। हर कोई व्यक्ति जिसको बच्चों से […]
Dec 23rd
अंग्रेजी के मध्य हिन्दी →
अमूमन आज तक यही देखने में आता था कि हिन्दी अखबार वाले या मीडिया वाले अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल अक्सर करते रहते हैं। लेकिन इंटरनेट पर हिन्दी का बढ़ता प्रभाव लगता है अब अंग्रेजी मीडिया भी महसूस करने लगा है। अभी एक दिन पहले ही आइ बी एन की साईट देख रहा था तो अंग्रेजी […]
Dec 23rd
नियमित ब्लागिंग करने के कुछ सुगम उपाय →
हमारे कुछ दोस्त बहुत अच्छे ब्लागर हैं। बहुत अच्छा लिखते हैं। लेकिन वे इंसान कहीं ज्यादा अच्छे हैं इसलिये वे नियमित नहीं लिखते। वे एक अच्छे ब्लागर होने का अपना और हमारा हसीन भ्रम बनाये रखना चाहते हैं। जैसे कभी-कभी सितम्बर महीने में लोग हिंदीगिरी करने लगते हैं, होली में सब बुढ़वे देवर लगने […]
Dec 21st
ओपन ऑफ़िस 2.x में हिन्दी वर्तनी जांचक लगाएँ. →
ओपन ऑफ़िस मुफ़्त एवं मुक्त उपलब्ध ऑफ़िस सूट है, जिसे एमएस ऑफ़िस के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. उन्मुक्त इसे प्रारंभ से ही इस्तेमाल करते रहे हैं और लिनक्स तंत्र में मैं भी इसे प्रयोग करता रहा हूँ. ओपन ऑफ़िस में हिन्दी वर्तनी जांच की सुविधा अंतर्निर्मित नहीं है. परंतु आप स्वयं इसे कुछ सरल चरणों के जरिए संस्थापित कर सकते हैं. इसके लिए निम्न चरण हैं- हिन्दी शब्दकोश यहाँ से डाउनलोड...
Dec 21st
क्या आप चोर हैं? - भाग ३ →
….. यदि गलती से कर भी ली है चोरी तो रखे अपने होश संभाल, पुनः गलती न कर बैठे बन के सीनाजोर पहलवान
Dec 21st
ब्लॉग यायावरी में यूनुस खान का कवितामयी दस्तक →
दैनिक भास्कर उज्जैन के आज (गुरूवार 20 दिसंबर 2007) के संस्करण में यूनुस खान (जी हाँ, अपने रेडियोवाणी वाले) की निम्न कविता प्रकाशित हुई है – (मुझे भास्कर की साइट पर रचना की कड़ी खोजने से भी नहीं मिली, हालांकि अब ये साइट यूनिकोड पर आने लगी है. अतः कविता की स्कैन की गई छवि के साथ ही कविता भी प्रस्तुत है:) ————. छोटे शहर के संकोची बच्चे हम छोटे शहर के बच्चे थे अब...
Dec 20th
नंदीग्राम के कामरेड का बयान - पवन की एक कविता →
ये कविता इस सप्‍ताह के रविवारीय जनसत्‍ता में प्रकाशित हुई है- छापे में अभी भी ‘कैडर के लोगों’ का जमावड़ा है इसलिए इस कविता का छपना हमें अच्‍छा लगा। सामान्‍यत: हम पर कविताई में लिप्‍त होने का आरोप नहीं लग पाता है (एकाध पर बहके हैं, पर लती नहीं ही हैं) इसलिए कविता का ब्‍लॉगपक्ष बता दें कि कैडरबद्ध पत्रकारिता के चलते कविता जनसत्‍ता के संपादकीय कार्यालय से अयोघ्‍या से बाबरी की तरह...
Dec 20th
अबे जंगली इंडियन तेरा गूस तो पक गया →
  लीजिए एक कार्टून देखें जी हमें बिलकुल मालूम है कि अमरीका में जब कहते हैं इंडियन, तो उसका मतलब भारतीय नहीं होता। पर उसके बावजूद हमें इस कार्टून में बहुत कुछ चिढ़ाने वाला लगता है। आप क्‍या कहते हैं ? यूँ तो एक सीधे सीधे संस्‍कृति के तत्‍वों का मामला है,  कि भैया वहॉं यानि अमरीका में अपने समाज के एक तबके को लेकर जो दरअसल अमरीका का असल मालिक तबका है, यानि मूल अमरीकी लोग उन्‍हें लेकर वे क्‍या...
Dec 19th
हिन्दी कंप्यूटरी की कहानी : वेद प्रकाश की जुबानी →
पुस्तक समीक्षा हिन्दी कंप्यूटरी सूचना प्रौद्योगिकी के लोकतांत्रिक सरोकार हिन्दी कम्प्यूटरी के भूत-वर्तमान-भविष्य की रोचक, उत्तेजक, मनोरंजक, अत्यंत ज्ञानवर्धक, और साथ ही, जाहिर है विडंबना-गाथाओं से भरपूर, कहानी हिन्दी अधिकारी वेद प्रकाश ने अपनी किताब - हिन्दी कंप्यूटरी - सूचना प्रौद्योगिकी के लोकतांत्रिक सरोकार में लिखी है. प्रारंभ में ही अपनी बात कहते हुए वेद प्रकाश बताते हैं – ...
Dec 18th
चिठेरी उवाच- आजा इंग्लिश सिख लें →
चिठेरी को देखकर चिठेरा ऐसे खुश हो जाता है जैसे कोई मासूम खुराफ़ती किसी विवाद को फ़ैलाकर प्रफ़ुल्ल्तित होता है! चिठेरा: अरी ओ चिठेरी, किधर गयी तू दिखती नहीं। एकदम्मै समीरलाल बन गई। चिठेरी: अरे सब जगह हल्ला मच गया था। ब्लागर मीट मुर्दाबाद-मुर्दाबाद। सो हम दुबक गये कोने में! तुम भी दिखे नहीं। चिठेरा:हां , […]
Dec 17th
जरूरतमंद तक सबसे बाद में क्‍यों पहुँचती है तकनीक →
तकनीक को जो लोग मूल्‍यों से निरपेक्ष समझते हैं वे शायद उसे पूरी तरह नहीं समझते। विज्ञान का इतिहास इस बात का साक्षी है कि विज्ञान जगत भी उतनी ही किस्‍म राजनीतियों से दो चार होता है जितना कि मानविकी के क्षेत्र। मूल्‍यों का संघर्ष तकनीक के अखाड़े में भी वेसे ही होता है जैसा कि दूसरे हर क्षेत्र में। इसलिए जब ऐस्‍क्लेटर्स पर झपट कर सवार होते जवान लोगों के लिए तकनीक ‘बराबरी’ का ही मामला है...
Dec 17th
ब्लॉगर, साहित्यकार से आगे है, और रहेगा. →
(पिछले दिनों अनिल ने ब्लॉगर बनाम आम साहित्यकार पर विचारोत्तेजक लेख लिखा था जिसे आगे बढ़ाते हुए दिलीप ने हिन्दी चिट्ठाजगत् में गैंग और माफ़िया की बातें कीं और आरोप लगे कि लोगों ने ब्लॉग दुकानें सजा ली हैं. मगर, मेरा मानना है कि चिट्ठाकारी में गैंग और माफिया जैसी चीजें सिर्फ और सिर्फ काल्पनिक हैं, ठेठ कल्पना की उपज हैं और न कभी हो सकती हैं और न हो सकेंगी. जिसकी दुकान में माल बढ़िया, सार्थक होगा...
Dec 17th
गनीमत है गया बिग बैंग →
शहर के बीचों बीच बैठे हैं, बोले तो कनॉट प्‍लेस का सेंट्रल पार्क। आए तो देखने कि कैसे वो भद्दा घंटाघर बिग बैंग शहर के बीचों बीच टांग दिया है। आए तो सुखद अनुभूति हुई कि बिग बैंग हटा दिया गया है।  ओस भरी शाम है सर्द पर खुशनुमा। बच्‍चे किलक रहे हैं। नए लैपटाप के साथ जाहिर है मन ललच रहा हे कि पहली आऊटडोर पोस्‍ट ठेल दी जाए।   तो इस सूचना के बहाने कि हमारे शहर दिल्‍ली पर लंदन के मेयर को खुश करने के लिए...
Dec 16th
भैया, एक तमंचा लेन हतो →
दो दिन पहले गड़गांव में आठवीं में पढ़ने वाले एक बच्चे ने अपने सहपाठी के सीने में चार गोलियां उतार दीं। चार खुद उतारीं फिर पांचवी के लिये तमंचा अपने दोस्त को दे दिया- ले तू भी उतार ले। लोगों का कहना है- भारत भी अमेरिका हो रहा है। अमेरिका में ऐसा होता था। बच्चे अपनी पिस्तौल […]
Dec 16th
बुरा भी उतना बुरा नहीं यहां →
आज एक और कविता पढ़वा रहा हूं आपको। यह कविता मुझे बहुत प्रिय लगती रही। बहुत दिनों तक पूरी याद भी रही। इस बीच डायरी गुम हो गयी थी। अब मिली तो सोचा आपको यह पढ़ा दें जो हमें अच्छा लगता है। शायद आप भी पसंद करें। बुरा भी उतना बुरा नहीं यहां दर्पण पर शाम […]
Dec 14th
मैडोनाजी, आप चिंता न करें हम आपके साथ् हैं →
कल एक समाचार पढ़ा अखबार में कि मैडोना को बुढ़ापे से डर लगता है। मुझे बड़ा अजीब लगा। अभी तक हम सुनते आये थे कि सुन्दरियां, गायिकायें और माडल काक्रोच , छिपकली, सांप, चूहे, बिल्ली आदि से डरते हैं। लेकिन पचास की होने को आई मैडोना बुढ़ापे से डरती हैं। कारण बताते हुये उन्होंने बताया कि […]
Dec 13th
कष्ट, क्रोध और उदासी भरा एक दिन... →
सुबह 6 बजे अलार्म की घंटी बजी तो मजबूरन ठंड में ठिठुरते हुए उठना पड़ा. सुबह 6 बजे नल आता है. वह भी एक दिन छोड़कर. आज नल आने की बारी थी. और कभी तो ये भी होता है कि उठ कर नल को निहारते रहो… और वो आता नहीं. थोड़ी देर बाद नगर निगम का पोंगा चिल्लाता है - नल शाम को या दोपहर आएगा. और अपनी कमी छुपाने के लिए बहाने भी बनाता है - बिजली सप्लाई सही नहीं मिलने के कारण पानी की टंकिया पूरी भर नहीं...
Dec 11th
आलोक पुराणिक किंड्यूटीविमूढ हो गये →
सबेरे की ड्यूटी बजा के आये तो देखा चिठेरी-चिठेरी अपनी बजा रहे थे। चिठेरहाव इतना मचा था कि कुछ सुनायी नहीं दे रहा था। जो समझ पाये वह यहां दिया है। अपना दिमाग लगाकर समझने का प्रयास करियेगा। शायद कुछ समझ आ जाये। चिठेरी: अरे चिठेरे आ कुछ बतिया। तू तो कल दिखा ही नहीं। […]
Dec 10th
क्या आप चोर हैं? - भाग २ →
….. कहीं से कुछ यूँ ही न लें, आँखें खुली रखें, जाँच परख लें
Dec 9th
एमएस ऑफ़िस हिन्दी 2007 – एक त्वरित नजर →
यूँ तो हिन्दी एमएस ऑफ़िस 2007 के लिए मैंने कोई तीन-चार महीने से पंजीकरण करवाया हुआ था. माइक्रोसॉफ़्ट की साइट पर वादा किया गया था कि वो सीडी या डीवीडी पंजीकृत पते पर भेजेंगे. परंतु इंतजार करता रहा था – कब वो मिले और कब उसे जांचें-परखें. इससे पहले एमएस ऑफ़िस 2007 का अंग्रेज़ी संस्करण देख चुका था और, उसमें उसके ऊटपटांग किस्म के, कन्फ़्यूजिंग रिबन इंटरफेस के अलावा कोई नई चीज मेरे जैसे साधारण उपयोक्ता...
Dec 9th
आपत्ति फ़ूल को है माला में गुथने में →
आपत्ति फ़ूल को है माला में गुथने में, भारत मां तेरा वंदन कैसे होगा? सम्मिलित स्वरों में हमें नहीं आता गाना, बिखरे स्वर में ध्वज का वंदन कैसे होगा? आया बसंत लेकिन हम पतझर के आदी, युग बीता नहीं मिला पाये हम साज अभी, हैं सहमी खड़ी बहारेंनर्तन लुटा हुआ, नूपुर में बंदी रुनझुन की आवाज अभी। एकता किसे कहते हैं […]
Dec 7th
स्‍वागत करें, ब्‍लॉगिंग अब पत्रकारिता पाठ्यक्रम का... →
मूलत: जो शीर्षक सोचा था इस पोस्‍ट का वह था, सावधान ब्‍लॉगिंग अब पाठ्यक्रम का हिस्‍सा होने जा रही है। कुछ कुछ सुधीशजी वाली पोस्‍ट की तरह। पर फिर खुद को सुधार लिया। माना विश्‍वविद्यालय चिरकुटई के महामिलन स्‍थल होते हैं पर कब तक हर चीज से सावधान, हैरान परेशान होते रहेंगे। आने दो ससुरे पाठ्यक्रम को भी देखें हमारा क्‍या बिगाड़ लेता है। बहुत होगा तो ये कि इतिहास में चार नाम पढ़ाने लगेगा, अमुक ने शुरू...
Dec 7th
क्या आप चोर हैं? →
….. शायद आप भी चोरी कर रहे हों। अंजाने में होने वाली चोरी भी चोरी ही होती है।
Dec 5th
इंटरनेट पर अभिव्‍यक्ति की आजादी का मिथ →
बहुत से इंटरनेट प्रयोक्‍ताओं की ही तरह मुझे भी सरकार द्वारा इंटरनेट माध्‍यम को नियंत्रित करने की हर कोशिश आला दरजे का घटियापन लगती है। आज एक कार्यशाला में अपने परचे में चीमा ने बातें रखी जिनमें से कुछ तो पहले से ज्ञात थीं बाकि की दिशा पता थी पर एक साथ सुनकर फिर से बुरा लगा। पहली बात तो ये कि इंटरनेट पर नियंत्रण के लिए सरकार ने कई ढांचे तैयार कर रखे हैं। यं सभी वैधानिक नहीं हैं, कई तो बाकायदा...
Dec 5th
कि पुरुष बली नहिं होत है… →
घड़ी बेरहम घनघनाई। हम कुनमुना के फ़िर् सो गये। सोये कहां? रजाई की रेत में शुतुरमुर्ग की तरह दुबक गये। घड़ी फिर घनघनाई। बेरहम । मशीन है। देखती नहीं अगला किस स्थिति में है। बस समय बता दिया। उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई। उठो चाय पिलाऒ फ़िर हम भी उठें- कहकर पत्नीश्री फ़िर रजाई में […]
Dec 5th
मुझे इस पोस्ट से नफ़रत है... →
आउटब्रेन - एक नो नॉनसेंस ब्लॉग रेटिंग सेवा आपके लिए अब पूरी तरह हिन्दी में अपनी सेवा लेकर आ गए हैं. इसे अब आप अपने ब्लॉग पर लगाइए, और औरों की रेटिंग एक क्लिक पर पाइए. और, यदि आपको कहीं पर किसी चिट्ठे पर आउटब्रेन की रेटिंग लगी हुई दिखाई देती है, जैसे कि इस चिट्ठे पर, और उस पोस्ट से आपको नफ़रत है तो बजाए एक पेजी विवादित टिप्पणी लिखने के, बस एक चटखा वहां पर लगाइए जहाँ यह उभर कर आता है - मुझे इस...
Dec 4th
विचारों की आजादीः कहीं लगे आधा कहीं लगे ज्यादा →
कुछ दिनों गायब रहने के बाद आया तो देखा कि मेरी पिछली पोस्ट पर पारूल की टिप्पणी थी कि मैं इस बाबत क्यों कर हिन्दी चिट्ठाजगत में सवाल पूछ रहा हूँ वो भी भारतीय नारी से। वहीं घुघुती जी का कहना था कि किसी को कोई कष्ट ना हो तो कुछ भी पहने यानि दो […]
Dec 4th
काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाये →
मुंबई ब्लागर मिलन में अनिल रघुराज का गीत सुनकर अद्भुत आनंद आया। इस गीत के संदर्भ में अपने मामा डा.कन्हैयालाल नंदन का आत्मपरक लेख याद आ गया। इस लेख में उन्होंने अपने उन दिनों की याद की थी जब उनकी संवेदना को उनके गुरू डा.ब्रजलाल वर्मा संवार रहे थे। उन्होंने लिखा था- मैं हाई […]
Dec 4th
ऐडसेन्स या नॉनसेन्स? - भाग २ →
….. एक अनसुलझी पहेली जिसकी गिरफ़्त में आप कभी भी आ सकते हैं
Dec 3rd
ऐडसेन्स या नॉनसेन्स? →
….. अपना भला आप न करे, कर ले दूसरे का इंतज़ार
Dec 1st